शनिवार, 13 जून 2026

नीलोफर, सफेद कमल, Nymphaea alba

नीलोफर, कमल के पौधे की एक आम तौर से पायी जाने वाली वैराइटी है. इसे सफेद कमल, नीलोतपल, White Water Lily और Nymphaea alba भी कहते हैं. 

इसके उगने का समय बरसात का मौसम है. यह कीचड़ भरे तालाबों में पैदा होता है. बरसात में जब तालाब पानी से भर जाते हैं तो इसका बीज फूटता है. इसके बीज बहुत सख्त होते हैं और एक कैप्सूल के आकार के होते हैं. इसके आलावा तालाबों में इसके जड़ें भी रह जाती हैं जिनसे यह पौधा फिर से निकलता है. तालाब इसके चौड़े पत्तों से ढक जाता है जो पानी के ऊपर तैरते रहते हैं. 

इसका फूल एक लम्बी डंडी में लगता है जिससे यह पानी की सतह से ऊपर रहता है. फूल की नाल या डंडी लगभग एक से दो फुट लम्बी होती है. इसके सफेद फूल के बीच पीले रंग का जीरा या पराग होता है. इसके फूल में कुछ नीली सी आभा होती है इसी लिए इसे नील कमल  और नीलोफर कहते हैं. अंग्रेजी में इसका नाम  Nymphaea alba यानि सफेद जलपरी है. 


जैसे इसका नाम सुंदर है ऐसे ही इसका काम भी सुंदर है. गर्मी और बरसात के मौसम में पैदा होने के कारण यह ठंडे और तर स्वभाव वाला है. इसका प्रयोग गर्मी की बीमारियो में और दिमाग को शांत करने और दिल को शक्ति देने के लिए हकीम करते हैं. ठंडे पेय पदार्थों या शर्बत में हकीम इसका प्रयोग वर्षों से कर रहे  हैं. इसके बीज की गिरी बलवर्धक है और पेशाब खुलकर लाती है. 

इसकी जड़ों या कमल नाल की सब्ज़ी भी बनाकर खायी जाती है. इसके फल को कमल गट्टा कहते हैं. इसमें कैप्सूल के आकार के बीज भरे होते हैं जिन्हे कच्चा भी खाया जाता है और सूख जाने पर इसकी गिरी को दवाओं में प्रयोग करते हैं. 

 

रविवार, 17 मई 2026

कपिकच्छु, केवांच, कौंच Mucona pruriens

कपिकच्छु एक बेल है जो झाड़ियों और पेड़ों पर लिपटती है. इसे केवांच, कौंच, आदि भी कहते हैं. इसमें सेम की तरह फलियां लगती हैं लेकिन वह सेम की फलियों से ज़्यादा मोटी और गोलाई लिए होती हैं और इन पर रोआं होता है. इस रोएं के कारण ही इसे अंग्रेजी में velvet bean या मखमली फली कहते हैं. 

इसका नाम कपिकच्छु इसलिए पड़ा है कि बंदर जब इसे छूने या इसके पास जाने की कोशिश करता है तो इसका रोआं लग जाने से बहुत खुजली होती है. तभी इसे बंदर की खुजली या कपिकच्छु नाम दिया गया. 

अंग्रेज़ों ने देखा कि इसकी खुजली गायों के लग जाती है तो उन्होंने इसका नाम cowitch गाय की खुजली या cowhage रखा. 

इसकी फलियों पर बारीक़ रेशे या रोआं होने के कारण ही इसे कवच शब्द से पहचान मिली। यानि यह फली ऐसी है जिसने अपनी रक्षा के लिए कवच बना रखा है. इसकी फलियां सूखने पर इसका रोआं हवा से उड़ने लगता है और उधर से निकलने वालों के शरीर में खुजली पैदा करता है. 


यह दो प्रकार का होता है. एक के बीज सफेद रंग के दूसरे के बीज काले होते हैं. इसके बेज मोटे सेम के बीजों के आकर के लेकिन बड़े होते हैं. बरसात में इसकी बेलें खूब बढ़ती हैं और जाड़ों में इसमें फूल आते हैं. इसकी फलियों की सब्ज़ी भी बनाकर खाई जाती है. इसके छिलके का ऊपर का भाग छीलकर निकाल देते हैं. या फिर केवल बीजों की ही सब्ज़ी बनाते हैं. 

सफेद कौंच की फलियां कच्ची हालत में साफ़ हरी दिखाई देती हैं. जबकि  काले कौंच की फलियां कच्ची हालत में कुछ कालापन लिए होती हैं. 

पहले ज़माने में इसके रुएँ को पेट के कीड़े मारने के लिए गुड़ के अंदर रख कर खिलाते थे जिससे यह पेट में जाकर कीड़ों को नष्ट करे. लेकिन यह एक खतरनाक दवा है और इसका प्रयोग खतरे से खाली नहीं। 

कौंच के बीजों का प्रयोग बलवर्धक और पुरुष यौन विकारों के इलाज में  किया जाता है.  कौंचपाक  एक आयुर्वेदिक दवा है जिसका मुख्य अवयव कौंच है. 

कौंच मूड को अच्छा बनाने, डिप्रेशन दूर करने और एक जनरल टॉनिक के रूप में अच्छी वनस्पति है.  इसके बीजों का प्रयोग शुद्ध करके ही किया जाता है. इन बीजों को पानी या दूध में भिगोकर उबाल लिया जाता है और उनका छिलका उतरकर सुखाकर कूटकर दवा में प्रयोग किया जाता है. बिना शुद्ध किए प्रयोग करने से यह नुक्सान करता है और गंभीर समस्याएं उतपन्न होती हैं. 

इस वनस्पति में रक्तरोधक गुण भी हैं. विशेष तौर से बवासीर के खून को बंद करने में सहायक है यदि इसका विधिवत प्रयोग किया जाए. 


गुरुवार, 14 मई 2026

खेजड़ी, जंड, शमी Prosopis cineraria

खेजड़ी, खेजड़ा, जंड एक रेगिस्तानी वृक्ष है. इसे शमी भी कहा जाता है. पंजाब में इसे जंड कहते हैं और इसकी फलियों को सांगर या सांगरी। इन फलियों की सब्ज़ी बनाकर खाई जाती है. अरबी फ़ारसी में इसे गाफ कहा जाता है. इसका वानस्पतिक नाम Prosopis cineraria है. 

 

इस पेड़ में जनवरी में फूल खिलने लगते हैं. फूल हल्के पीले रंग के एक लम्बी शाखा में लगते हैं और  उनका आकार बोतल साफ़ करने वाले ब्रश की तरह लगता है. फूलों के बाद इसमें लम्बी फलियां लगती हैं. इन फलियों को सांगर या सांगरी कहते हैं. 

रेगिस्तानी इलाकों में, विशेषकर राजस्थान में, सऊदी अरब और अरब के अन्य देशों में इसका बड़ा महत्व है. यह पशुओं के चारे के रूप में भी काम आता है. दूर से देखने पर इसके वृक्ष बबूल की तरह ही लगते हैं. इसकी पत्तियां भी बबूल से मिलती जुलती होती हैं. इसमें कांटे भी होते हैं. लेकिन यह कांटे छोटे होते हैं और बबूल की तरह लम्बे नहीं होते। 

मुंह के छालों के लिए इसकी पत्तियां चबाई जाती हैं जिससे मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं. 

बुधवार, 13 मई 2026

पुत्रजीवक, जियापोता, Putranjiva roxburghii

जियापोता एक माध्यम आकार का वृक्ष है. इसे पुत्रजीवक भी कहते हैं और आयुर्वेद में इस पौधे के बीजों का बड़ा महत्व है. इसका वानस्पतिक नाम Putranjiva roxburghii है. जैसा कि इसके नाम से ज़ाहिर है इसका प्रयोग बांझपन दूर करने और संतान उत्पत्ति के लिए किया जाता है. पुत्र से मतलब संतान से है ऐसा नहीं है कि पुत्रजीवक के इस्तेमाल से केवल पुत्र ही प्राप्त होता है. 


यह पौधा बांझपन दूर करने के स्वभाव के कारण पुत्रजीवक के नाम से प्रसिद्ध है. संतान उत्पत्ति के मामले में  एक अन्य जड़ी बूटी जो आयुर्वेद में प्रयोग की जाती है वह शिवलिंगी है. शिवलिंगी के बीज और जियापोता के बीज दोनों समान मात्रा में मिलाकर चूर्ण के रूप में गाय के दूध के साथ आधे से एक छोटा चमच दिन में दो या तीन बार प्रयोग किये जाते हैं. इसका प्रयोग रजोपरांत किया जाता है. कहा जाता है कि लगातार तीन माह तक इसके प्रयोग से निःसंतान स्त्रियों को भी संतान प्राप्त होती है. 

यह केवल स्त्रियों की दवा नहीं है. इसका प्रयोग पुरुषों द्वारा भी किया जाता है. यह स्पर्म की गुणवत्ता को बढ़ाता है और आम स्वास्थ्य में सुधार लाता है. 

यह बहुत कमाल की दवा है. शिवलिंगी के साथ प्रयोग करने से इसके गुण जाग्रत हो जाते हैं.लेकिन इसका प्रयोग आयुर्वेदिक चिकित्सक की निगरानी और उसकी सलाह से ही करें। 

  

मंगलवार, 12 मई 2026

मरोड़ फली Helicteres isora, (Indian Screw plant)

मरोड़ फली एक बेलनुमा झाड़ीदार पौधा है. यह मध्यम ऊंचाई का होता है.  इस पौधे की बनावट में ऐंठन होती है. इसकी फलियां ऐसी लगती हैं जैसे किसी ने रस्सी की तरह बल देकर ऐंठ दिया हो. 

नेचर जो पेड़, पौधे  पैदा करती है उसके गुणों का अंदाज़ा बाहरी आकर, बनावट, गंध से भी हो जाता है. मानो नेचर ने मनुष्य को इशारा किया हो कि यह पौधा किस उपयोग में लाया जा सकता है. जैसे मरोड़ फली का ऐंठा होना इस बात का सूचक है कि यह ऐसे रोगों में जहां ऐंठन, मरोड़ का प्रभाव हो कारगर सिद्ध हो सकती है. 


हकीमों ने इसे पेट की ऐंठन, मरोड़ के लिए इस्तेमाल किया और वे इसके गुणों को देखकर चकित रह गये. पेट की ऐंठन ज़्यादातर पेचिश, खुनी पेचिश आदि में होती है जब आंतों के तंतु सुकड़कर ऐंठने लगते हैं ऐसे में मरोड़ फली बहुत काम की दवा है. यह न केवल ऐंठन को दूर करती है इसका एन्टिसेपटिक स्वभाव कीटाणुओं को  भी नष्ट करता है और दर्द से राहत दिलाता है. 

इसका प्रयोग पेट के रोगों में जैसे दस्त, पेचिश, मरोड़, तधा आँतों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में किया जाता है. यह आंतो की सूजन घटाती है, आँतों की खराश को दूर करती है और पाचन को बेहतर बनाती हैं. मरोड़ फली रक्त शोधक भी है. हकीम और वैद्य इसका इस्तेमाल ज़रूरत के अनुसार करते हैं. इसे अन्य दवाओं  के साथ काढ़े के रूप में या पाउडर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. किसी भी दवा के इस्तेमाल से पहले काबिल हकीम या वैद्य की सलाह ज़रूरी है. यही बात मरोड़ फली के इस्तेमाल में भी ध्यान रखें। 


सोमवार, 11 मई 2026

अड़ूसा Adhatoda Vasica

अड़ूसा एक सदाबहार पौधा है। यह मध्यम ऊंचाई का होता है। इसे खेतों और बागों की मेड़ों पर बाढ़ के रूप में लगाया जाता है। इसके सफेद फूल गुच्छों में लगते हैं। इसके फूलों से इसकी पहचान आसानी से हो जाती है।

फूल गिरने के बाद इसका फल लगता है जो लगभग एक इंच लंबा और एक धारी से दो भागों 
 बटा दिखाई देता है। इस फल में काले रंग के बीज होते हैं।
में 

इस पौधे को बीज से या फिर इसका दब्बा लगाकर नया पौधा बनाया जा सकता है। कटिंग से भी लग जाता है।

खांसी, सीने और फेफड़ों के रोग इससे ठीक होते हैं। कहते हैं कि खांसी इस दुनिया में नही रह सकती जबतक वासा इस दुनिया में है। यह स्वभाव से एंटीसेप्टिक है। पेट के कीड़े भी इसके प्रयोग से समाप्त हो जाते हैं। दवाई के रूप में इसके पत्ते इस्तेमाल किये जाते हैं। इनका काढ़ा बनाकर पिलाते हैं।

यह वासा जाति का पौधा है। इसी की दूसरी जाति पियावासा कहलाती है। पीले फूलों के कारण ही इसे पीला वासा, या पीत वासा या पियावासा कहते हैं। पियावासा को वज्रदंती भी कहते हैं।


रविवार, 10 मई 2026

ढाक, पलाश, टेसू Butea monosperma

ढाक, पलाश, टेसू  एक वृक्ष है जिसके पत्ते बीते ज़माने में डिस्पोजेबल प्लेट्स की तरह इस्तेमाल किये जाते थे. उत्तरी भारत का यह बहुत जाना माना पेड़ है. हलवाई इसी के पत्तों से बने दौने  में मिठाई देते थे. हरे और सूखे दोनों तरह के पत्ते काम में लिए जाते थे. ढाक के तीन पत्ते एक शाखा में लगते थे जिससे कहावत बनी है ढाक के तीन पात. 



मार्च में यह पेड़ फूलों से लद जाता है. इसके पेड़ों को देखकर ऐसा लगता है जैसे जंगलों में आग लगी हो. फूलों का रंग गहरा नारंजी होता है. इन फूलों को पानी के साथ उबालने पर पीला रंग निकलता है जिसमें कपड़े रंगे जाते थे. इसके फूलों को टेसू के फूल कहते हैं. टेसू के रंगे कपड़े न केवल गर्मी में त्वचा को आराम देते है बल्कि स्किन की बीमारियों से भी बचाते हैं. 

टेसू का सामाजिक महत्व भी है. पहले इसी के रंग से होली का त्यौहार मनाया जाता था. ये आसानी से मिल सकता था और इसका रंग बिना पैसा खर्च किये फूलों को पानी के साथ पकाकर निकाला जा सकता था. 


टेसू के फूल दवाई में प्रयोग किये जाते हैं. सूजन और द्रर्द के इलाज में इनका बड़ा महत्व है. नसों  का फूल जाना, अंडकोष की सूजन, बवासीर का दर्द, गठिया की तकलीफ सभी में टेसू के फूल पानी में पकाकर उस पानी में कपड़ा भिगोकर दर्द और सूजन वाले स्थान की सिंकाई की जाती थी. 

इसके बीजों को पलाश पापड़ा कहा जाता है. इनका भी दवाई महत्व है. इसका गोंद कमरकस या चुनिया गोंद के नाम से बाज़ार मैं मिल जाता है और दवाई में इस्तेमाल होता  है.

सोमवार, 2 मार्च 2026

क्राउन आफ थॉर्न

क्राउन आफ थॉर्न या काँटों का मुकुट, यूफोर्बिएसी कुल का पौधा है. इसका तना कांटों भरा होता है. फरवरी, मार्च में इसमें गुच्छों में सुंदर फूल खिलते हैं. 


यह  दूध वाला पौधा है. कांटे अधिक होने से और ज़हरीला   इसे जानवरों से बचाता है. इसे सुंदर फूलों के लिए घरों और बगीचों में लगाया जाता है. इसका पत्ता या तना तोड़ने से दूध निकलता है जो ज़हरीला होता है और कीड़े मकौड़ों के मार सकता है आँख में जाने पर जलन, खुजली, सूजन पैदा करता है तधा त्वचा को भी नुकसान करता है. 

इसे बच्चों की पहुंच से दूर रखें और इसकी देखभाल करते समय सावधानी बरतें। 

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

बटरकप Buttercup, Ranunculus bulbosus

बटरकप एक सुंदर मौसमी पौधा है. इसे रैननकुलस बल्बोसस कहते हैं. इसका फूल  गुलाबी, सफेद, ऑरेन्ज, ब्लड रेड आदि रंगों का होता है. यह होम्योपैथी में एक महत्वपूर्ण दवा के रूप में प्रयोग किया जाता है. 


यह पौधा घरों और बगीचों में सजावटी पौधे के रूप में लगाया जाता है. इसके फूल फरवरी, मार्च में खिलते हैं. यह पौधा ज़हरीला होता है इसलिए इसे घरों में बच्चों की पहुंच से दूर रखें। ज़हरीला होने की वजह से इसे जानवर  भी नहीं खाते। 

इसका ज़हरीला प्रभाव त्वचा में खुजली पैदा करता है. खाने से पेट में पहुंचने पर यह मैदे और आँतों की सूजन पैदा कर सकता है जिससे पेट दर्द, मिचली, उलटी की शिकायत हो सकती है. 


होम्योपैथी में यह एक दर्द निवारक दवा है. त्वचा के रोगों, गठिया, सीने में दर्द, और आँखों के रोगों में सिम्पटम के अनुसार डाक्टरों द्वारा प्रयोग की जाती है. 

आम आदमी इसे प्रयोग न करें। सजावटी पौधों को घरों में बच्चों की पहुंच से दूर रखें।

सोमवार, 8 सितंबर 2025

कटेरी, Yellow fruit nightshade

 कंटकारी, बड़ी कटेरी, कटेरी, अडेरी, ममोली, छमक निमोली, एक कांटेदार पौधे के नाम हैं जिसे Solanum virginianum, Surattense nightshade, or yellow fruit nightshade  भी कहते हैं. देहात में इस पौधे को भट कटैय्या, ज़हर, जंगली बैंगन, कट बैंगन आदि नामों से भी जाना जाता है. 

इस पौधे के पत्ते कटे किनारों वाले लम्बे आकर के और कांटों से भरे होते हैं. इसका फल  गोल होता है वह भी काँटों से भरा होता है. इसमें बैंगन के फूल जैसा ही बैंगनी रंग का फूल खिलता है इसलिए इसे जंगली बैंगन कहा जाता है. इसके फूल और कंटीले पौधे से इसकी पहचान आसानी से हो जाती है. काँटों की वजह से इसे जानवर नहीं खाते और आम लोग भी इससे दूर ही रहते हैं. 

इसमें बैगनी, नीले रंग के फूल खिलते हैं. फूल एक शाखा में दो एक दूसरे विपरीत मुख किये हुए होते हैं. फूल के बीच  में पीले रंग का जीरा होता है. इसका फूल देखने में सुंदर लगता है और बैंगन के फूल की तरह होता है. 

गांव देहात में इसके फल को दवाई के रूप में प्रयोग किया जाता है. सूखा फल पीस छानकर थोड़ी मात्रा में सूंघने से बहुत छींकें आती हैं और पुराना रुका हुआ ज़ुकाम खुल जाता है.  इसी चूर्ण को पानी में मिलाकर खुजली और दाद पर लगाने से फायदा होता है. 

मंगलवार, 12 अगस्त 2025

कपूर का वृक्ष Camphora officinarum

 कपूर को काफूर भी कहते हैं।  ये बाजार में सफेद टुकड़ों के रूप में मिलता है. इसकी विशेष गंध होती है जो बहुत तेज़ होती है. कमरे में अगर कपूर रखा हो तो इसकी  गंध  दूर तक फैल जाती है. यह बहुत ज्वलनशील  होता है. इसे तमाशा दिखने वाले जीभ पर जलाकर दिखते हैं. 

बाजार में मिलने वाला कपूर सिंथेटिक होता है और नकली रूप से बनाया जाता है. असली कपूर वृक्ष से प्राप्त किया जाता है जो सफेद डलियों की शक्ल में होता है. कपूर का वृक्ष बड़ा होता है और इसकी आयु भी बहुत होती है. ये चीन, जापान, ताइवान, भारत लंका आदि में पाया जाता है. इसके वृक्ष में भी कपूर की गंध आती है. इसकी लकड़ी के टुकड़ों को पानी में उबालकर इसकी भाप को ठंडा करके कपूर प्राप्त किया जाता है. 


कपूर के  वृक्ष का वैज्ञानिक नाम  Camphora officinarum  है. इसमें सफेद फूल खिलते हैं और बाद में छोटे आकर के फल लगते हैं जो काले रंग के करी पत्ते के फलों की तरह होते हैं. 

कपूर की लकड़ी में कीड़ा नहीं लगता. इसकी गंध से कीड़े, मकोड़े दूर भागते हैं. दवाओं में कपूर का प्रयोग लगाने में किया जाता है. ये फंग्सनाशक और कीटाणुनाशक है. खुजली के लिए इसे नारियल के तेल में मिलाकर लगते हैं. यह ठंडक उतपन्न करता है और खुजली को आराम देता है. नाखूनों का कला पड़ना जो अक्सर फंगस की वजह से होता है के लिए कपूर को नारियल के तेल या वैसलीन में मिलाकर लगाना लाभ करता है. 

सर के दर्द, नज़ला ज़ुकाम, दर्द निवारक बाम में कपूर भी मिला होता है. नहाने के मेडिकेटेड साबुन में भी कपूर का प्रयोग किया जाता है. 

कपूर को कभी भी खाने की दवा के रूप में प्रयोग न करें। ये बहुत हानिकारक हो सकता है. 

गुरुवार, 7 अगस्त 2025

हरा सेब खाने के फायदे

हरा सेब खाने के फायदे बहुत हैं. सेब की बहुत सी वैराइटी उगाई जाती हैं जिनमें सेब के पकने से पहले जुलाई के महीने में बाजार में हरा सेब मिलने लगता है. इसका रेट कम होने के कारण इसे अमीर गरीब सभी आसानी से खरीद सकते हैं. 

हरा सेब कुदरत का एक वरदान है. यह मज़े में कुछ खट्टा होता है. इसकी चटनी बनाकर भी प्रयोग की जाती है. मुरब्बा बनाने  के लिए हरा सेब बहुत उपयुक्त रहता है. साबुत सेब का मुरब्बा बनाने के लिए हरा कच्चा सेब जो मीडियम आकर का हो प्रयोग किया जाता है. इसे छीलकर पानी में डालते रहते हैं जिससे यह काले न पड़ें. छीलने के लिए भी स्टेनलेस स्टील की छुरी, चाकू का प्रयोग करें. इन्हें अच्छी तरह धोकर पानी में जबतक उबालें कि यह थोड़ा नरम हो जाएं. उसके बाद शकर की चाशनी बनाकर सेब उसमें डाल दें. 

अगर आपने ठीक प्रकार सेब के लिए चाशनी बनाई है तो यह मुरब्बा खराब नहीं होता. फिर भी अगर सड़ने से बचाना हो तो फ्रिज में रखें. इसके अतिरिक्त बाजार के मुरब्बे में सड़ने से बचाने के लिए सोडियम बेंजोएट का प्ररोग किया जाता है. 

इसी प्रकार सेब को छोटा काटकर जैम भी बनाया जा सकता है. जैम एक पेस्ट जैसा होता है. 

सेब का मुरब्बा दिल और दिमाग की ताकत के  लिए फायदेमंद है. यह पेट को भी साफ़ रखता है और इसमें आवश्यक विटामिन और मिनरल्स भी होते हैं. सबसे बढ़कर यह की घर का बनाया मुरब्बा अनावश्यक रंगों और केमिकल से भी बचा रहता है. 

कच्चा हरा सेब आँखों के लिए बहुत फायदेमंद है. इसके खाने से खून पतला रहता है और दिल के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी है. 
 

सोमवार, 4 अगस्त 2025

खुरफ़ा जंगली Purslane नोनिया का साग

 खुरफ़ा जंगली को लोनिया का साग या नोनिया भी कहते हैं. इसे भी साग सब्ज़ी की तरह पकाकर खाया जाता है.  जड़ी बूटी के रूप में भी इसका उपयोग किया जाता है. 

बाजार में जो कुलफा का साग मिलता है वह बड़े पत्ते वाला होता है. जंगली कुलफा या खुरफा छोटी पत्ती  वाला होता है. इसमें पीले फूल खिलते हैं. इसे नोनिया, या नोनिया का साग भी कहते हैं. 


यह खेतों में, खाली पड़े स्थानों में, गमलों में अपने आप उग आता है. इसके उगने का समय मार्च अप्रेल से जुलाई अगस्त तक है.  इसे बड़े चाव से लोग सब्ज़ी के रूप में  खाते हैं. 

जंगली लुनिया लाल रंग के फूलों वाली और नोनिया पीले फूल वाला दोनों  एक ही कुल के पौधे हैं. इसलिए इनका स्वभाव भी एक है. इसमें पानी  की मात्रा अधिक और पौष्टिक पदार्थ कम होते हैं. इसलिए यह मोटे लोगों के लिए फायदेमंद है. इसके खनिज पदार्थ जैसे मैगनीशियम, लोहा और कैल्शियम सेहत को दुरुस्त और हड्डियों, दांतो के लिए फायदेमंद है. 

यह सुपाचक है इसलिए पाचन तंत्र की समस्याओं के लिए लाभकारी है. 

लेकिन ध्यान रखें इसमने अक्ज़िलेट होता है जो गुर्दे की पथरी वाले मरीज़ों के लिए नुकसानदेह है. 

बुधवार, 30 जुलाई 2025

दस बजे का फूल, लुनिया जंगली (Portulaca)

 लुनिया जंगली एक छत्तेदार बूटी है जो बरसात में उगती है. यह पोर्टुलका ग्रान्डीफ्लोरा  की एक जंगली वैराइटी है. यह पार्टलेकैसी कुल का पौधा है. आम भाषा में इसे लुनिया कहते हैं. पोर्टुलका ग्रान्डीफ्लोरा के पौधे सुंदरता के लिए घरों में लगाए जाते हैं. इसमें खूबसूरत गुलाब से मिलते जुलते फूल खिलते हैं. इसकी पत्तियां मांसल, लम्बे आकर की होती हैं और यह पौधा घास की तरह ज़मीन पर फैलता है. 


इसे आसानी से कटिंग से लगाया जा सकता है. इसकी शाखा को ज़मीन में लगा देने से वह बहुत जल्दी जड़ पकड़ लेता है और फूल भी जल्दी खिलने लगते हैं. यहां पर लुनिया जंगली का फोटो दिया जा रहा है. इसी प्रकार के पौधे में घनी पंखुड़ियों वाले फूल खिलते हैं. यह जंगली वैराइटी है इसलिए इसके फूल इकहरी पत्ती के और छोटे आकर के हैं. इसे दस बजे का फूल भी कहते हैं क्योंकि यह दिन में दस बजे के लगभग खिलता है. 

 इसी पार्टलेकैसी कुल का दूसरा पौधा  पोर्टुलका ओलेरेसिया है जिसे परसले कहते हैं. आम भाषा में खुरफा का साग के नाम से बाजार में मिलता है. इसके पत्ते भी मांसल लेकिन आगे से नुकीले होने के बजाय गोलाई लिए होते हैं. इसकी जंगली वैराइटी को लोनिया का साग या नोनिया का साग कहते हैं और इसे सब्ज़ी की तरह इस्तेमाल करते हैं.  बाजार में मिलने वाला खुरफा, या कुल्फ़ा का साग बड़े पत्तों का होता है और जंगली उगने वाला कुल्फ़ा छोटे आकर के पत्तों का होता है. दोनों में पीले फूल खिलते हैं. 

रविवार, 27 जुलाई 2025

अगावे अमेरिकाना Agave Americana/ Century Plant

 अगावे अमेरिकाना एक सजावटी पौधा है.  इसकी बहुत सी प्रजातियां हैं. इसे सेंचुरी प्लांट भी कहते हैं. यह अपने मज़बूत रेशों के लिए जाना जाता है. इसके पत्तों के सिरे पर एक मज़बूत कांटा होता है. कई बार बच्चे खेलते समय और बड़े इसकी देखभाल करते समय अनजाने में इसके कांटो से ज़ख़्मी हो जाते हैं. 

इसकी जड़ से दूसरे नए पौधे निकलते हैं जिन्हे निकालकर अन्य जगहों पर लगाया जा सकता है. ये कम पानी पसंद करता है इसलिए इसे ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत नहीं पड़ती. 

घरों में इसके पौधे गमले में भी लगते हैं लेकिन ज़मीन में लगाने पर ये काफी बड़ा हो जाता है. इसके पत्तों को कुचलकर या पानी में सड़ाकर रेशा निकाला  जाता  है जो रस्सी बनाने में काम आता है.  देहात में इस पौधे को राम बांस के नाम से लोग जानते हैं. 


इस पौधे की एक प्रजाति से टकीला बनाई जाती है जो एक मशहूर शराब का ब्रांड है.  इस पौधे के आगावे टकीला ही कहते हैं. 

दवाई गुणों के आधार पर आगावे का गूदा कब्ज़ दूर करने वाला और लैक्सेटिव है. इसके अतिरिक्त यह पेशाब को अधिक मात्रा में लाता है जो इसका डाययुरेटिक गुण है. 

होम्योपैथी में इसे जो दवा बनाई जाती है वह कुत्ता काटने के कारण हुए हलकाव, या पानी से डरने, हाइड्रोफोबिया में प्रयोग की जाती है.

हाइड्रोफोबिया में आगावे को  चाव से खाने  का उदाहरण 

जॉन हेनरी क्लार्क ने होम्योपैथिक मटेरिया मेडिका में हाइड्रोफोबिया का एक केस जो  एल - सिंगलो मेडिको से एच-रिकार्डर द्वारा कोट किया गया है, का उद्धरण किया है.  काटे जाने के साढ़े चार माह बाद एक लड़के को हाइड्रोफोबिया हो गया.  उसे गले से निगलना असम्भव हो गया और उसे नर्सो को अस्पताल में काटने से बचाने के लिए रोकना पड़ता था. डाक्टर ने उसे अस्पताल में उगे आगावे के पत्ते का एक टुकड़ा दिया जिसे लड़के ने बड़े चाव से खाया. वह आगावे को चाव से खता रहा और धीरे धीरे उसका रोग ठीक होता गया. लेकिन उसने आठवें दिन आगावे खाने से मना कर दिया और कहा कि  यह बहुत कड़वा है और मुंह  में जलन डालता है. 








सोमवार, 17 जून 2024

इस बरसात जंगल लगाएं

जंगल कैसे लगाएं 

जंगलों का क्षेत्र तेज़ी से सिमट रहा है. इसलिए ज़रूरी है कि प्रत्येस नागरिक जंगल लगाने की ज़िम्मेदारी ले. ये बहुत आसान है. एक छोटा सा समूह बनाकर ये काम किया जा सकता है. नरसरी से वुडेन पौधे यानि वे पौधे जो लकड़ी वाले हैं और बड़े वृक्ष बन जाते हैं खरीदे जा सकते हैं. 

 

इन पौधों में अमलतास, अर्जुन, बढ़ल, नीम, शीशम, सागौन, जामुन, आम, बहेड़ा, करंज, चिलबिल, कनक चम्पा जिसे मुचकुन्द भी कहते हैं, और बकायन जैसे पौधे लगाए जा सकते हैं. यूकेलिप्टिस जिसे नीलगिरि भी कहते हैं एक समय काफी मात्रा में लगाया गया था लेकिन बाद  में  ज्ञात हुआ कि ये पौधा पानी की अधिक मात्रा चाहता है और इससे भूमिगत जल के स्रोतों को हानि पहुंचती है. इसलिए इसका रोपण बंद कर दिया गया. लेकिन ये पौधा दलदली जमीनों पर अब भी लगाया जाता है. 

बिना पैसा खर्च किये पौधे कैसे लगाएं. 

बिना कोई पैसा खर्च किये भी आप पौधे लगा सकते हैं. इसके लिए बरसात का मौसम सबसे अच्छा है. इसके लिए घर में खाने वाले फलों के बीज या गुठलियां इकठ्ठा कर लें. इन बीजों से आप ये पौधे लगा सकते हैं. : 

इमली :

इमली का वृक्ष बड़ा होता है. बीज से आसानी से पौधे उग आते हैं. बाज़ार से घर में प्रयोग के लिए लायी गयी इमली  के बीज फेंकें नहीं.   दो या तीन बीज गीली मिट्टी में रखकर  मिट्टी का एक लड्डू के आकार का गोला बनाएं और उसे सूखने दें. ध्यान रहे इसे छाया में ही सुखाएं. 

आम :

आम का पौधा बहुत आसानी से उगता है. कूड़े वाले स्थानों पर बरसात में जहां आम की गुठलियां फेंकी जाती हैं आम के पौधे उग आते हैं. बस आप को करना ये है कि इस बार आम खाकर गुठलियां रख लें. 

लीची:

इसका पौधा भी बहुत आसानी से उगता है. इसकी गुठलियां भी संभालकर रखें. 

आड़ू: 

इसका पौधा ज़रा मुश्किल से उगता है. लेकिन गुठली बजाए फेंकने के संभालकर रखें. 

जामुन: 

जामुन का पौधा बहुत जल्दी उगता है. इसकी गुठली भी खाने के बाद सुखाकर रख लें. 

जब बरसात कई दिन होकर ज़मीन अच्छी तरह भीग जाए तो आप इन गुठलियों को ऐसे ही किसी भी खाली स्थान पर फेंक सकते हैं. छोटे बीजों को मिट्टी के लड्डू में रखकर फ़ेंक दें. ये काम ऐसे स्थानों पर करें जहां थोड़ी बहुत घास फूस, झाड़ी आदि हो. इससे फायदा ये होगा की पौधा जब उगेगा तो घास या झड़ी के बीच में सुरक्षित रहेगा. और बरसात में अच्छी बढ़वार पकड़ लेगा.  आप के इस तरह बिखेरे हुए बीजों और गुठलियों से अगर कुछ पौधे भी बच गए तो धरती को हरा भरा करने में एक बड़ा योगदान होगा. 

ये केवल एक उदाहरण है. आप इस प्रकार बहुत प्रकार के पौधे लगा सकते हैं. 

तो आइये इस बरसात धरती को हरा भरा बनाने में सहयोग दें. 



शुक्रवार, 14 जून 2024

लाशोरा, लहसोड़ा Glue Berry, Cordia dichotoma

लाशोरा, लहसोड़ा  एक माध्यम ऊंचाई के वृक्ष का फल है. ये कुछ गोल आकर लिए 2 से ढाई सेंटीमीटर के व्यास का फल होता है. पकने पर ये प्याज़ी रंग का हो जाता है. इसके अंदर चिपचिपा गूदा होता है जो ग्लू की तरह होता है इसलिए इसे अंग्रेजी में ग्लू बेरी या चिपचिपा फल कहते हैं. 


ये चिपचिपा फल बड़े काम की चीज़ है. इसी की नस्ल का एक और फल है जो आकार में छोटा और शेप में तिकोना नोकदार सा होता है जिसे लभेड़ा कहते हैं. 

इसका अचार बनाया जाता है. इसके कच्चे फल को थोड़ा सा उबालकर सिरके में भी डालते हैं जो एक अच्छे हाज़मा करने वाले अचार का काम करता है. 

इसका पक्का फल अपने चिचिपिन या लेसदार होने के कारण आंतो और आमाशय के अल्सर और जख्मों के लिए फायदेमंद है. इससे जख्म जल्दी भर जाते हैं. 

इसका स्वभाव या मिज़ाज गर्म और तर है. धातु रोगी इसके पक्के फलों के सेवन से ठीक हो जाते हैं. स्त्रियों में  श्वेत प्रदर या लियोकोरिया के लिए इसके पक्के फलों का नित्य सेवन बहुत लाभकारी होता है. इसके कच्चे फलों को सुखाकर पीसकर तीन से पांच ग्राम की मात्रा में सुबह शाम सेवन करने से भी यही लाभ होता है. 

 इसकी दूसरी वैरायटी जिसे लभेड़ा कहा जाता है, के सूखे फल दवा में बहुतायत से उपयोग किये जाते हैं. नज़ला जुकाम, खांसी में जोशांदे के रूप में इसका प्रयोग होता है. 

लभेड़ा का प्रयोग देसी दवाओं में बहुतायत से किया जाता है. इसे सुखाकर दवाओं में प्रयोग करते हैं. इन दोनों फलों का मौसम मई जून का है. जून में इनके फल पक जाते हैं. और दोनों प्रकार के पहल पककर मीठे हो जाते हैं. इनका रंग हल्का सा गुलाबी होता है. इस रंग को प्याज़ के रंग से मिलने के कारण प्याज़ी रंग कहते हैं. 



तपता सूरज सिमटते जंगल

जंगलों को बचाने की जो कवायद थी उसमें सारी दुनिया के देश फेल हो रहे हैं.  पिछले पांच वर्षों में केवल भारत में जंगलों का क्षेत्र लगभग साढ़े छ लाख हेक्टेयर कम हुआ है. ये ब्राज़ील के बाद दुनिया का दूसरा बड़ा जंगलों के क्षेत्र का नुकसान  है.  


बढ़ती शहरी आबादी, तेज़ी से होता औद्योगीकरण सबसे पहले शहरी क्षेत्र और गांव की ज़मीनो और खेतों को खाते हैं. सिमटते हैं और उनकी जगह पर कालोनियां, सड़कें, हाइवे और फैक्ट्रियां लगती हैं. उसके बाद गांव की जनता का पलायन शुरू होता है. जब खेती किसानी खत्म हो जाती है. बाग़ बगीचे नहीं रहते तो गांव का किसान या तो मज़दूरी करने शहर का रुख करता है या फिर अपनी बची खुची ज़मीन बेचकर बाहर निकल जाता है. इससे न केवल शहरो पर अनावश्यक बोझ पड़ता है, उनकी आबादी तेज़ी से बढ़ती है. पानी के संसाधनों पर दबाव पड़ता है और जल संकट की समस्या भी पैदा होती है. 

जंगलों के इस कटान ने पर्यावरण को भी बहुत नुकसान पहुंचाया है. इसकी वजह से बारिशें कम हुई हैं. हरियाली खत्म हो जाने से बारिश का पानी जमीन में नहीं जा पाता और फालतू बह जाता है जिससे न केवल बाढ़ की समस्या पैदा होती है बल्कि भूगर्भ जल संकट की समस्या भी पैदा होती है. 

पानी की अत्यधिक दोहन से, जमीन से ज़्यादा पानी निखोदे कालने से भूगर्भ जल संकट गहरा रहा है. पानी का लेवल कम होता जा रहा है. पानी के ओवर हेड टैंक के लिये  ज़्यादा गहरे बोरवेल बनाये जा रहे हैं. ज़मीन के अंदर का पानी खत्म हो जाने के बाद पानी के साधन बहुत कम रह जाएंगे. 

इसलिए जंगल बचाने की बहुत ज़रूरत है. 


   

बुधवार, 6 सितंबर 2023

महल कंघी Actiniopteris Radiata

महल कंघी एक ऐसा पौधा है जो ऊंची दीवारों, चट्टानों की दरारों में उगता है.  ये छोटा सा गुच्छेदार पौधा एक प्रकार का फर्न है. इसकी ऊंचाई 5 से 10 सेंटीमीटर के लगभग होती है. इस पौधे की कुछ रों पत्तियां सूखी होती हैं  कुछ हरी। इस पौधे का फैलाव इसकी जड़ों से होता है. स्पोर्स भी इसके फैलाओ में सहायक होते हैं जो हवा के साथ उड़कर दूर तक पहुंच जाते हैं और उचित वातावरण मिलने पर नए पौधे बनाते हैं. 

हिन्दी में इसे कुछ लोग मयूर शिखा भी कहते हैं क्योंकि इसके पत्ते कटे किनारीदार होते हैं. लेकिन मयूर शिखा का नाम कन्फूज़न पैदा करता है.  मुर्गा केस cocks comb celosia flower को भी मयूर शिखा उसके फूलों की वजह से कहा जाता है. 

ऊंची दीवारों और महलों के कंगरों पर उगने के कारण इसका नाम महल कंघी पड़ा है जो उचित है और इसके मिजाज से मिलता है. 

इसके पौधे सितंबर अक्तूबर में सूखने लगते हैं और दीवारों पर सूखे गुच्छे से रह जाते हैं. बरसात आने पर नए पौधे पुरानी जड़ों से फूट निकलते हैं. 

इसका प्रयोग वर्षों से देसी और घरेलू दवाओं में किया जा रहा है. इस पौधे में घाव को भरने की शक्ति है. इसलिए इसको पीसकर घाव पर लगाने से घाव जल्दी ठीक हो जाते हैं. ये एक कीटाणुनाशक का कार्य भी करता है. 

इसका स्वभाव ठंडा और तर है. इसलिए मुंह के छालों में कत्थे के साथ इसकी पत्तियां चबाने से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं. ल्यूकोरिया में इसकी चार पांच पत्तियों को पीसकर दूध के साथ दिन में दो बार लेने से आराम होता है. 

इसके आलावा भी इस पौधे को बच्चों के पेट के कीड़े मारने के लिए भी प्रयोग किया जाता है. पत्तियों का पेस्ट बनाकर चीनी के साथ बच्चे की आयु के अनुसार दो से चार ग्राम की मात्रा में खिलाया जाता है. ये खुराक दो से तीन दिन तक दी जाती है. इस दौरान ये देखा जाता है की बच्चे का पेट ठीक रहे और उसे कब्ज़ न हो. आवश्यकतानुसार रेचक दवा भी दी जाती है जिससे पेट के कीड़े मरकर बाहर निकल जाते हैं. 

जड़ी बूटी कोई भी हो और कितनी ही लाभदायक हो उसका प्रयोग किसी काबिल हकीम ये वैध की निगरानी में ही करें क्योंकि कई बार पौधे को पहचानने में गलतियां हुई हैं और कई बार मरीज के मिजाज से विपरीत होने के कारण गंभीर परिणाम उत्पन्न हुए हैं. 

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मंगलवार, 8 अगस्त 2023

कनक चम्पा / मुचकुन्द का वृक्ष

 कनक चम्पा , मुचकुन्द  एक बड़ा वृक्ष है. इसके पत्ते बड़े और कटे किनारों वाले, मैपल के पत्तों से मिलते जुलते होते हैं. बड़े होने के कारण इसके पत्ते टहनियों में इस प्रकार लटकते हैं की मुरझाये हुए से लगते हैं.


फरवरी से लेकर जुलाई महीने तक इसमें बड़े बड़े हलके पीले रंग के फूल खिलते हैं. ये फूल पीली चमेली जिसे आम तौर से चंपा कहा जाता है के फूलों के सामान होने के कारण ही इसका नाम कनक चम्पा पड़ा है. 

वैसे इसका नाम संस्कृत पुस्तकों में मुचकुन्द है. ये सारे भारत में पाया जाने वाला पौधा है और विविध पर्यावरण में आसानी से लग जाता है. इसकी लकड़ी का रंग लाल होता है. इसे इमारती लकड़ी के रूप में प्रयोग किया जाता है. 


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