शनिवार, 7 जनवरी 2017

कसूरी मेथी

मेथी और कसूरी मेथी. दोनों अलग अलग पौधे हैं. आम तौर से मेथी के बीजों को मेथी और मेथी की सूखी हुई पत्तियों को कसूरी मेथी समझ जाता है.

मेथी की हरी पत्तियों को सब्ज़ी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. सर्दी के मौसम में अकटूबर से फरवरी तक बाजार में मेथी के पत्तियां मेथी के साग के नाम से मिल जाती हैं. सोया, मेथी और पालक की पत्तियों को साग के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. यही पत्तियां सुखाकर सर्दी के सीज़न के अलावा विभिन्न प्रकार की डिश में प्रयोग की जाती हैं. ये न सिर्फ खाने को सुगन्धित बनाती हैं बल्कि इनके बहुत से फायदे भी हैं.
मेथी का बीज जिसे आम तौर से मेथी ही कहते हैं बाजार में मिल जाता है. इसे भी मसाले के रूप में खाने में प्रयोग किया जाता है. इसकी अपनी विशेष सुगंध होती है. मेथी का बीज दावा के रूप में भी इस्तेमाल होता है. और ये एक बहुत कारगर दावा है.

कसूरी मेथी का नाम अविभाजित पंजाब में कसूर नाम के स्थान से  जुड़ा हुआ है. कसूर पहले लाहौर में था अब ये पाकिस्तान का एक डिस्ट्रिक्ट है. कसूरी मेथी की पत्तियां मेथी  की पत्तियों से कुछ भिन्न होती है. सूख जाने पर इनमें से अच्छी खुश्बू आती है. कसूरी मेथी का बीज आम मेथी से छोटा होता है. दोनों तरह की मेथी को खाने में इस्तेमाल किया जाता है.
मेथी डायबेटिज़ के मरीजों के लिये फायदेमंद है. इसका साग या मेथी के बीजों का पाउडर नियमित इस्तेमाल में रखने से डायबेटिज़ को कंट्रोल में रखता है.
मेथी में विभिन्न प्रकार के पॉइज़न को सोख कर शरीर के बहार निकलने की शक्ति है. इसके साग के रोशे आँतों के कैंसर से बचाते हैं.
ये जोड़ों के दर्द की बेजोड़ दावा है. बढे हुए पेट को कम करती है. चर्बी को घटाती है. स्लिम होने के लिए यहाँ एक बेजोड़ फार्मूला दिया जाता है.
मेथी का बीज 50 ग्राम, ओरिजिनल ग्रीन टी की पत्ती 50 ग्राम, इसबगोल की भूसी जिसे सात इसबगोल या इसबगोल हस्क भी कहते है 100 ग्राम और कलौंजी 20 ग्राम. इन सबको ग्राइंडर में डालकर पाउडर बनालें. गर्म पानी के साथ एक छोटा चमच सुबह और एक शाम. 3 माह के लगातार इस्तेमाल से मोटापा जाता रहता है. जोड़ो का दर्द, कब्ज़, ब्लड प्रेशर की भी अचूक दवा  है.

सोमवार, 2 जनवरी 2017

खट्टी बूटी

ये बूटी आम भाषा में खट्टा स्वाद होने के कारण खट्टी बूटी और खटकल के नाम से जानी जाती है. तीन पत्तियों के कारण तिपतिया, और अंग्रेजी भाषा में  वुड सोरेल, या ऑक्ज़ेलिस के नाम से प्रसिद्ध है. ये गीली और नम जगहों पर उगती है. इसे छायादार स्थान और नमी पसंद है. क्यारियों और खली पड़ी जगहों पर बहुतायत से उग आती है.
इसकी बहुत से प्रजातियां हैं. आम तौर  से छोटे छोटे पीले फूल वाली बूटी पायी जाती है. लाल रंग के फूल और सफ़ेद की वैराइटी भी पायी जाती हैं. इसमें छोटी फलियां लगती हैं. जिनमें बारीक बीज होते हैं. फलियां चटककर बीज बिखर जाते हैं और नए पौधे जमते हैं.

इसका खट्टापन ऑक्ज़ेलिक एसिड के कारण होता है. इसका अजीब प्रयोग मधु मक्खी और कीड़े मकौड़ों के काटने में होता है और बड़ा कारगर है. यहाँ तक की बिच्छू के काटने पर भी असरदार पाया गया है. काटी  हुई जगह पर इसकी पत्तियों को रगड़ने से दर्द और जलन जाती रहती है. ये प्रयोग बहुत लोगों पर कारगर सिद्ध हुआ है.


इसका स्वाभाव ठंडा है. प्यास को शांत करती है. इसे खाने से बार बार प्यास नहीं लगती. लू लगजाने पर इसकी चटनी बनाकर खाने से आराम मिलता है.
गठिया के रोगियों, वे लोग जिनके गुर्दे या पित्ते में पथरी हो, को ये बूटी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. ऐसे मरीजों को ये बूटी नुकसान करती है.
इसका इस्तेमाल काम मात्रा में फ़ायदा पहुंचता है. ऑक्ज़ेलिक एसिड की वजह से ज़्यादा इस्तेमाल नुकसानदेह होता है. पेशाब जलन के साथ आने लगता है. एसिडिटी के रोगी भी इसे इस्तेमाल न करें.


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