मंगलवार, 25 अगस्त 2026

सागौन, Teak Wood Tree, Tectona grandis

सागौन, सागवान या टीक का  वृक्ष एक बहुउपयोगी वृक्ष है. इसको इमारती लकड़ी प्राप्त करने के लिए लगाया जाता है. यह पचास, साठ फुट या इससे भी अधिक ऊंचाई तक बढ़ सकता है. यह सीधा बढ़ता है और इसकी लकड़ी मज़बूत होती है. मज़बूत होने के साथ ही यह कोरों  या शीशम जैसी भारी नहीं होती। 

इसकी लकड़ी का उपयोग फर्नीचर बनाने, नावें और जहाज़ बनाने में किया जाता है क्योंकि यह पानी से जल्दी खराब नहीं होती। इमारती कामों में दरवाज़े और खिड़कियां बनाने में भी इसका बहुत उपयोग होता है. 


इसके पत्ते बड़े बड़े होते हैं. इनमें रोएं होते हैं जिससे यह खुरदुरे लगते हैं. पत्तों का उपयोग खाने के लिए प्लेटें बनाने में किया जाता है या फिर खोमचे वाले इसके हरे पत्तों का उपयोग खाने की वस्तुएं देने के लिए करते हैं. 

बरसात में इसमें गुच्छों में फूल खिलते हैं. यह फुल सफेद रंग के और छोटे होते हैं. इसका बीज रसभरी की तरह एक आवरण से ठका रहता है. इसका बीज गोलाकार, रोएंदार होता है. इसके फूलों और गुच्छों की वजह से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है. 



सोमवार, 17 अगस्त 2026

गोंदनी, गोंदी का वृक्ष, Cordia sinensis, Cordia gharaf

गोंदनी, या गोंदी एक मध्यम आकार का वृक्ष है. इसका वैज्ञानिक नाम Cordia sinensis है.  इसमें पीले संतरे के रंग के छोटे फल लगते हैं. यह खाने में मीठे और चिपचिपे होते हैं. यह लभेड़े और लाशोरे की प्रजाति का वृक्ष है. 

इसका वृक्ष अधिक ऊंचाई तक नहीं बढ़ता। इसमें सूखे वातावरण को सहन करने की अद्भुत शक्ति है. इसकी जड़ें ज़मीन में गहरी जाती हैं इसलिए यह सूखे मौसम को आसानी से बर्दाश्त कर लेता है. इसका स्वभाव लभेड़ा की तरह ही ठंडा होता है. इसका चिपचिपा पदार्थ खांसी, और बलगम निकालने में सहायता करता है. इसका चिपचिपा पदार्थ आंतो की समस्याओं में भी लाभकारी है. यह आँतों के हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करता है. वे इसमें लिपटकर आसानी से बाहर निकल जाते हैं. 

इसके पौधे में दो बार फल आते हैं. गर्मियों में मई जून माह में इसके फल पक जाते हैं. दोबारा नवंबर, दिसंबर में इसमें फल आते हैं. 

बच्चे और चिड़ियां इसके पहल बहुत चाव से खाती हैं और इसके छोटे बीज दूर तक बिखेरने का साधन बनती हैं. जैव विविधता के लिए इसके पौधों को लगाना चाहिए। फलों से लदा यह पेड़ बहुत सुंदर लगता है. 

फालसा Grewia asiatica, Phalsa

 फालसा का पेड़ बहुत ऊंचा नहीं होता। यह एक माध्यम आकार का छोटा वृक्ष है. इसके पत्ते खुरदुरे और रोयेंदार होते हैं. इसे बागों में किनारे पर लगाया जाता है. बाग़ लगाने वाले आम के बाग़ में कुछ पौधे फालसा के, कुछ जामुन के, कुछ बढ़ल के, कुछ गोंदी जैसे वृक्षों के लगा देते थे. इससे एक तो जैव विविधता बनी रहती थी और दूसरी और बाज़ार में इनके फल बेचने पर अलग से कुछ आमदनी भी हो जाती थी. 


फालसा मई से जून तक मिल जाता है. इसके फल आकार में छोटे होते हैं. पकने पर यह पहले लाल रंग के हो जाते हैं और अधिक पकने पर इनका रंग बैगनी काला सा हो जाता है. इनका स्वाद खट्टा  - मीठा होता है. इसके मिलने का समय अधिक लम्बा नहीं होता। यह स्वाभाव से ठंडा होता है. और इसे शर्बत वाला फल भी कहते हैं. क्योंकि इसका शर्बत बनाया जाता है जो गर्मियों में शीतलता प्रदान करता है. 

गांव के लोग इसकी छाल को त्वचा रोगों में जैसे दाद और छाजन के लिए भी प्रयोग करते हैं. इसको पीसकर लगाने से इसके जीवाणुनाशक गुण के कारण त्वचा रोग ठीक हो जाते हैं. 

इसका पौधा आसानी से लगाया जा सकता है. बड़े गमले में भी हो जाता है. और लगाने के तीन वर्षों के बाद इसमें फल आने लगते हैं. यह एक ऐसा पौधा है जिसे अधिक देखभाल की भी ज़रूरत नहीं होती। 

 

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