फालसा का पेड़ बहुत ऊंचा नहीं होता। यह एक माध्यम आकार का छोटा वृक्ष है. इसके पत्ते खुरदुरे और रोयेंदार होते हैं. इसे बागों में किनारे पर लगाया जाता है. बाग़ लगाने वाले आम के बाग़ में कुछ पौधे फालसा के, कुछ जामुन के, कुछ बढ़ल के, कुछ गोंदी जैसे वृक्षों के लगा देते थे. इससे एक तो जैव विविधता बनी रहती थी और दूसरी और बाज़ार में इनके फल बेचने पर अलग से कुछ आमदनी भी हो जाती थी.
फालसा मई से जून तक मिल जाता है. इसके फल आकार में छोटे होते हैं. पकने पर यह पहले लाल रंग के हो जाते हैं और अधिक पकने पर इनका रंग बैगनी काला सा हो जाता है. इनका स्वाद खट्टा - मीठा होता है. इसके मिलने का समय अधिक लम्बा नहीं होता। यह स्वाभाव से ठंडा होता है. और इसे शर्बत वाला फल भी कहते हैं. क्योंकि इसका शर्बत बनाया जाता है जो गर्मियों में शीतलता प्रदान करता है.
गांव के लोग इसकी छाल को त्वचा रोगों में जैसे दाद और छाजन के लिए भी प्रयोग करते हैं. इसको पीसकर लगाने से इसके जीवाणुनाशक गुण के कारण त्वचा रोग ठीक हो जाते हैं.
इसका पौधा आसानी से लगाया जा सकता है. बड़े गमले में भी हो जाता है. और लगाने के तीन वर्षों के बाद इसमें फल आने लगते हैं. यह एक ऐसा पौधा है जिसे अधिक देखभाल की भी ज़रूरत नहीं होती।

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