गुरुवार, 5 मार्च 2020

मुंडी बूटी

मुंडी बूटी एक ऐसा पौधा है जिसकी विशेष गंध होती है. इसके पत्ते रोएंदार होते हैं. ये रबी की फसल का पौधा है और अक्सर गेहूं के खेतों में भी खर-पतवार के साथ में उगता है. इसमें गोल गोल घुंडियां सी लगती हैं. ये मुंडी का फूल है जो बैगनी रंग का होता है. यही घुंडी सूखकर भूरी पड़ जाती है और इसके अंदर बीज बन जाते हैं.यही मुंडी है जिसे गोरखमुंडी भी कहते हैं. यही फल दवा में काम आते हैं.
मुंडी का स्वाद कड़वा होता है. स्वभाव से ये ठंडी और तर है. इसका प्रयोग गर्मी में किया जाता है. मुंडी मार्च- अप्रैल में तैयार हो जाती है जब इसके पौधे सूख जाते हैं. मुंडी बहुत बड़ी रक्त शोधक जड़ी बूटी है. इसका यही एक गुण सौ गुणों पर भारी है. यूनानी और आयुर्वेद में जितनी रक्त-शोधक दवाएं बनायीं जा रही हैं उनमें से शायद ही कोई ऐसी हो जिसमें मुंडी का इस्तेमाल न हुआ हो.
जिन लोगों का मिज़ाज गर्म है, गर्मी, खुश्की और खुजली से परेशान हैं उनके लिए मुंडी बहुत लाभकारी है. ये रक्त की गर्मी को शांत करती है और रक्त से गंदगी, और टॉक्सिन निकाल देती है.
हकीमों का फार्मूला है अगर ब्लड में टॉक्सिन न रहें तो बहुत सी बीमारियों से बचा जा सकता है. इसके लिए गर्मी के मौसम में मार्च आखिर से जून तक रक्त शोधक दवाओं का प्रयोग करना चाहिए. मुंडी उनमें से एक है.
आंखों के लिए मुंडी बड़े कमाल की दवा है. इसके इस्तेमाल से आंखे हमेशा निरोग बनी रहती हैं. कहा जाता है की यदि कोई सीज़न में रोज़ाना सुबह मुंडी का अर्क इस्तेमाल करता है तो वह न कभी अंधा होगा और उसे कभी मोतियाबिंद भी नहीं होगा.
गुरु गोरखनाथ, जो प्रसिद्ध योगी गुज़रे हैं, के नाम से दो जड़ी बूटियां मशहूर हैं. - एक मुंडी बूटी जिसे उनके नाम पर गोरखमुंडी कहते हैं. दूसरी जड़ी बूटी गोरखपान है.
मुंडी का प्रयोग इसके अर्क के रूप में किया जाता है. मुंडी का अर्क भपके से डिस्टिलेशन किया हुआ पानी होता है जिसको 25 - 50 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह शाम प्रयोग किया जाता है. पिसी हुई मुंडी का चूर्ण 1 - 3 ग्राम की मात्रा में उपुक्त अनुपान, (मुनासिब बदरका) जैसे काला नमक, शहद, शकर के साथ मिलाकर पानी के साथ खाया जाता है.
विशेष प्रयोग में एक मुंडी साबित भी निगली जाती है.


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